वर्तमान अमेरिकी नीति और भारत के हित

 

पिछले कुछ समय में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि विश्व में अस्थिरता का दौर अपनी पराकाष्ठा पर है, ऐसे मेें एक तरफ़ विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका तो दूसरी तरफ़ विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत है, जिसके मध्य फिल्हाल आर्थिक स्तर पर टैरिफ़ को लेकर खींचतान चल रही है; दूसरे कार्यकाल मेें अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के तल्ख तेवर निर्विवाद रूप से दुनिया के तमाम देशों के लिए सकारात्मक संकेत नहीं है। इसी क्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा करके भारत के आर्थिक गलियारों में हलचल मचा दी है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के बाद से भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों में लगातार तेज़ी आई। हालांकि बीते कुछ समय से ख़ासकर ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल से ही राष्ट्रपति ट्रम्प कभी ऑपरेशन सिंदुर पर भारत और पाकिस्तान के बीच; तो कभी कम्बोडिया और थाईलैंड के बीच मध्यस्थता कराने की बात करके विश्व समुदाय की नज़रों मेें शांतिदूत बनने की कोशिश करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ रहे हैं और ऐसा हो भी क्यों न राजनीति के कुछ दिग्गजों की थ्योरी कहती है कि बीते कुछ समय से अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प चाहते हैं कि किसी तरह उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल जाए; ऐसे में इसलिए यहाँ भारत द्वारा तेल खरीद कर रूस की अर्थव्यवस्था को आर्थिक सहायता पंहुचाना ट्रम्प को रास नहीं आ रहा वह किसी भी तरह युद्ध विराम कराकर शांति का नोबेल पुरस्कार पाना चाहते हैं। 
हालांकि दूसरी थ्योरी के अनुसार यह भी कोई नई बात नहीं है जब अमेरिका ने अपनी खीझ टैरिफ़ के माध्यम से निकाली हो इससे पहले भी कई बार वह ऐसा कर चुका है; दुनिया में अपनी पैठ को और गहरा करने तथा दबदबा कायम रखने के उद्देश्य से वह अक्सर इस तरह का कुछ न कुछ नया करता रहता है; और आज के समय में ऐसा होना अमेरिका की दृष्टि से प्रासंगिक भी है; ऐसा इसलिए क्योंकि यह सर्वविदित है कि लगभग पिछले तीन सालों के लम्बे समय से रूस युक्रेन के साथ एक सक्रिय युद्ध की स्थिति में है और ऐसे में शुरू से ही अमेरिका के कट्टर प्रतिद्वंदी रहे रूस के लिए वह यह कभी नहीं चाहेगा कि रूस किसी भी तरह से युद्ध की स्थिति से बाहर आ पाए; रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन का रूस के विरुद्ध लगभग तीन वर्षों तक टिके रहना, नाटो के देशों और अमेरिका द्वारा यूक्रेन को लगातार पहुंचाई जाने वाली सामरिक सहायता किसी से छुपी नहीं है; और यही कारण है कि रूस अब तक इस युद्ध में उलझा हुआ है; अमेरिका के लिए यह लड़ाई विश्व में शक्ति संतुलन स्थापित करने से कहीं ज़्यादा वर्चस्व कायम करने की होड़ मात्र है और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं ; क्योंकि कहीं ना कहीं अमेरिका और ट्रंप यह अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी अर्थव्यवस्था और उद्योग जगत का बहुत बड़ा हिस्सा हथियारों के कारखाने के रूप में है जिसका सुचारु रूप से चलना अमेरिका और उसकी अर्थव्यवस्था दोनों के ही हित में है; रूस के युद्धकाल में भी भारत और रूस के बीच और भी अधिक गहराती हुई दोस्ती; अमेरिकी प्रतिबंध के बावजूद रूस से हथियारों की आपूर्ति या विश्व समुदाय में भारत की बढ़ती साख और दो टूक भारत की विदेश नीती ट्रम्प को रास नहीं आ रही है; जिसका स्पष्ट उदाहरण है कभी टैरिफ़ बढ़ाने की घोषणा करना; तो कभी ऑपरेशन सिंदूर के शुरू होते ही पाकिस्तान को कई मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता प्रदान कर देना है; जिस से यह साफ़ हो जाता है कि रूस के प्रतिद्वंदी के तौर पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के निशाने पर रूस ही नहीं बल्कि उसके मित्र राष्ट्रों भी हैं; रूस से लगातार बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात कर भारत ने युद्धकाल में रूस की अर्थव्यवस्था को गति देने का काम किया है; जो भारत-रूस की और भी गहराती मित्रता का परिचायक है। ऐसे में ट्रम्प की चिंता भी जायज़ है; और इसी चिंता में उनका पाकिस्तान प्रेम एक बार फ़िर से उजागर हो गया है जब उन्होंने अपने हालिया वक्तव्य में कहा कि क्या पता एक दिन भारत पाकिस्तान से तेल खरीदे हालांकि अभी तक यह साफ़ नहीं है कि वह पाकिस्तान में कौन से तेल संसाधन से तेल निकालकर भारत में बेचने की कयास लगाए बैठे हैं; हालांकि भारत ने भी यह साफ़ कर दिया है कि वह किसी के आगे नहीं झुकेगा। लेकिन ट्रम्प सरकार के इस कार्यकाल में उनकी नितियाँ और तेवर भविष्य में विश्व के ज़्यादातर देशों के लिए भारी पड़ सकते हैं जोकि एक अच्छा संकेत नहीं है; हालांकि अब देखने वाली बात यह है कि भारत किस तरह से इसका एक स्थायी तोड़ निकालता है क्योंकि यह मसला एक बार का नहीं बल्कि हरेक बार का है; हालांकि इसका उत्तर काफ़ी हद अपने आप में स्वयं आत्मनिर्भर भारत और डिजिटल इंडिया जैसे अभियानों का सुदृढ़ होना भी हो सकता है। जो आने वाले समय में एशिया ही नहीं बल्कि विश्व में भी भारत का दबदबा बनाए रखने में काफ़ी सहायक सिद्ध होगा।


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