डीआरडीओ(DRDO) की गौरवगाथा




डीआरडीओ यानी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाली रिसर्च एंड डेवलपमेंट विंग है, जिसकी स्थापना वर्ष 1958 में डॉक्टर डीएस कोठारी जी के नेतृत्व में देश को अत्याधुनिक स्वदेशी रक्षा उपकरण प्रणाली से लैस करने के उद्देश्य से की गई थी। वर्तमान में डॉक्टर समीर वी. कामत जी इसके मुख्य पद पर कार्यरत हैं, डीआरडीओ ने रक्षा के क्षेत्र में 1958 से लेकर के अब तक राष्ट्र सेवा में अतिसक्रियतावाद की भूमिका निभाई है। डीआरडीओ का आदर्श वाक्य है "बलस्य मूलम विज्ञानम" अर्थात शक्ति का स्रोत विज्ञान है, जो शांति और युद्ध में राष्ट्र को संचालित करता है और इसी आदर्श वाक्य की कसौटी पर चलकर डीआरडीओ आज भारत के अग्रणी रक्षा संस्थानों में से एक बन चुका है, इसके नाम अनगिनत उपलब्धियां और अनेकों कीर्तिमान स्थापित है।

तीन तरफ से समुद्र से घिरा प्रायद्वीपीय भारत दक्षिण एशिया में शुरू से ही अपने दो बड़े प्रतिद्वंद्वियों का सामना कर रहा था लिहाजा 1947-1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के पश्चात यह आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी, कि देश को अपनी संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखने के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि अग्रणी भी होना होगा। जिसका परिणाम डीआरडीओ जैसे एक उत्कृष्ट संस्थान के गठन के रूप में निकलकर सामने आया; जो आज के समय में विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान रखता है। 1958 से लेकर अब तक डीआरडीओ ने जल, थल,नभ के साथ-साथ दसों दिशाओं में अपनी उच्च गुणवत्ता वाले रक्षा उपकरणों के माध्यम से अपनी शक्ति का लोहा संपूर्ण विश्व में मनवाया है।
डीआरडीओ का इतिहास आज अपने आप में बहुत कुछ बयां करता है; पूर्व में डीआरडीओ की शुरुआत 10 प्रयोगशालाओं के साथ छोटे से बजट से शुरू हुई थी जो आज अपेक्षाकृत कई गुना बढ़कर कई सारी प्रयोगशालाओं के साथ आज भी गतिशील अवस्था में है; इसकी उपलब्धियों की लंबी चौड़ी सूची इसके गौरवशाली इतिहास का बखान स्वयं करती है।
आज डीआरडीओ 50 से अधिक प्रयोगशालाओं के साथ-साथ लगभग 5000 वैज्ञानिकों सहित लगभग 30000 से अधिक कर्मियों का एक नेटवर्क है जो रक्षा क्षेत्र के साथ-साथ तकनीक को भी उन्नत बनाने के उद्देश्य से कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक संपूर्ण भारतवर्ष में फैला हुआ है।
आत्मनिर्भर भारत के स्वर्णिम स्वप्न को पूरा करने के उद्देश्य से सशस्त्र बलों के लिए डीआरडीओ ने पृथ्वी और अग्नि श्रेणी की मिसाइलों की अच्छी खासी श्रृंखला तैयार कर दी है; इसके साथ-साथ स्वदेश निर्मित हल्के लड़ाकू विमान तेजस, पिनाका रॉकेट लॉनचर,जीवन रक्षा प्रणाली ,आकाश तथा पृथ्वी वायु रक्षा प्रणाली, किसी भी परिस्थिति को पूर्व में ही भाप लेने की क्षमता रखने वाले उन्नत किस्म के रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली में भारत को युद्ध के समय बढ़त दिलाने वाले अनेकानेक उपकरण और रक्षा प्रणाली हैं, जो राष्ट्र ही नहीं अपितु विश्व के समक्ष आत्मनिर्भर भारत के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं; जिससे भारत की सेना निश्चित रूप से आत्मनिर्भर और कई गुना शक्तिशाली हुई है।|
वर्तमान में डीआरडीओ की 50 से अधिक प्रयोगशालाओं में विविध विषयों की तकनीक को विकसित किया जा रहा है; जो आगे चलकर रक्षा क्षेत्र के साथ-साथ भारत के विकास का मार्ग भी प्रशस्त करेंगे, यह क्षेत्र कुछ इस प्रकार हैं:- विमानिकी, आयुध, इलेक्ट्रॉनिक्स, लड़ाकू विमान, इंजीनियरिंग प्रणाली, इंस्ट्रूमेंटेशन, मिसाइल, उन्नत कंप्यूटिंग और सिमुलेशन, विशेष सामग्री, नौसेना प्रणाली, जीवन विज्ञान, प्रशिक्षण सूचना प्रणाली और कृषि क्षेत्र; इन सबके अलावा प्रकाश और आयुध संबंधी उच्च स्तरीय परियोजनाएं अभी डीआरडीओ के पास सुरक्षित हैं और कई क्षेत्रों में तो यह क्षमता हांसिल भी की जा चुकी है।
आज 21 वी शताब्दी में छोटे एवं बड़े सभी देश आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर है ; अत्याधुनिक तकनीक और प्रौद्योगिकी के दम पर भविष्य के युद्ध लड़े जाएंगे, ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि हम तकनीक और प्रौद्योगिकी में स्वयं को अधतन करें; यह तब और भी जरूरी हो जाता है जब प्रतिद्वंदी और कोई नहीं बल्कि पड़ोसी देश ही हो।
बात यदि प्रतिद्वंदी की हो रही है तो ऐसे में हितैषी या मित्र देश को नहीं भूलना चाहिए, जिसके सहयोग से भारत ने आज मिसाइल क्षेत्र में विश्व भर में अपना लोहा मनवाया है, उन्नत मिसाइलों की कड़ी में ऐसी ही एक मिसाइल है ब्रह्मोस जो भारत और रूस के संयुक्त मिसाइल कार्यकम की उपज है जिसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मास्कोवा नदी के नाम पर है; ब्रह्मोस दरअसल एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है जिसकी रफ्तार ध्वनि की रफ्तार अर्थात 2.5 मैक से भी अधिक है, जो अविश्वसनीय रूप से 300 किलोमीटर तक अपने किसी भी लक्ष्य को सटीकता से भेद पाने में सक्षम है; समय के साथ यह और भी उन्नत होता जा रहा है, वर्तमान में इसके हाइपरसोनिक संस्करण पर भी काम चल रहा है, यह जल थल और यहां तक कि नभ से भी दागे जाने वाली मिसाइल की श्रेणी में शामिल हो गया है; जिसका परीक्षण सुखोई 30 एमकेआई से सफलतापूर्वक दागकर किया जा चुका है, इस कृत्य ने भारत को विश्व के चुनिंदा देशों की सूची में ला खड़ा किया है आज भारत ब्रह्मोस का निर्यातक भी बन चुका है तथा फिलीपींस इसका पहला आयातक देश है।
आज सिर्फ ब्रह्मोस ही नहीं अग्नि श्रृंखला की कई मिसाइलें बराक मिसाइल, हेलिना मिसाइल, स्वदेश निर्मित टैंक अर्जुन, स्वाति रडार; यहां तक कि 85 फ़ीसदी तक स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान तेजस भी डीआरडीओ की प्रौद्योगिकी का मात्र एक नमूना भर है; जो किसी भी परिस्थिति में दुश्मन के दांत खट्टे कर सकने में सक्षम है, भारत को दक्षिण चीन सागर में छोटे-छोटे पड़ोसी देशों को साथ लाकर उन्हें सामरिक तौर पर मजबूत भी करना होगा जिससे चीन के दक्षिण चीन सागर में बढ़ते प्रभाव को कम किया जा सके और उसकी विस्तारवादी सोच पर लगाम लगाई जा सके।
डीआरडीओ की उपलब्धियां इतनी ही नहीं है बल्कि इन सब से ऊपर उठकर डीआरडीओ आज भारत को और अधिक ताकतवर बनाने के उद्देश्य से भारतीय उद्योग विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान,शिक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान विकास को बढ़ावा देने में तथा मानव संसाधन और कौशल विकास को और मजबूत करने में तेजी से जुटा हुआ है।
2019 में जब विश्व भर में कोरोना विषाणु ने दस्तक दी तब डीआरडीओ ने कोविड-19 परीक्षण किट का आविष्कार किया जिसका फायदा लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंचा, इसके साथ-साथ डीआरडीओ द्वारा रोगियों के लिए बेड भी तैयार किए गए जिसने मानवता की एक नई मिसाल कायम की।
अंतरिक्ष में मानव की भूख शांत करने के उद्देश्य से बनाए गए कैप्सूल भी डीआरडीओ के आविष्कार का ही एक नमूना है; अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले उपग्रहों में भी कुछ कलपुर्जे भी डीआरडीओ निर्मित होते हैं; जो डीआरडीओ को जल, थल और नभ समेत अंतरिक्ष का भी विशेषज्ञ बनाता है; डीआरडीओ ने समय के अनुसार खुद को अद्यतन किया है और आज डीआरडीओ किसी भी प्रकार के साइबर हमले को नाकाम कर उसे ध्वस्त करने में सक्षम है|
डीआरडीओ के कुछ अन्य कार्य
डीआरडीओ समय-समय पर विदेशों के अनुसंधान संगठन और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों का आकलन करती रहती है।
डीआरडीओ भारत के वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकी विद्वानों को विदेशों में छात्रवृत्ति देने के उद्देश्य से अनुसंधानोन्मुखी संस्थान या व्यवसायिक निकायों के साथ सामंजस्य भी स्थापित करती है जो उसके प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आता है।
डीआरडीओ रक्षा मंत्री को प्रौद्योगिकी संबंधी सूचना और सलाह देने तथा उसका विश्लेषण कर रक्षा बजट के आवंटन में भी अपनी एक विशेष भूमिका रखता है; संघर्ष वाले क्षेत्र में रसद एवं हथियार संबंधी सलाह देने के कार्य से लेकर रक्षा संबंधी संस्थान और व्यवसायिक निकायों को तकनीकी एवं आर्थिक सहायता पहुंचाना डीआरडीओ के प्रमुख कार्यों में से एक है। विभिन्न मंत्रालय, गृह-मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, अन्य सरकारी विभाग, अनुसंधान एवं विभाग केंद्र, तटरक्षक बल, शैक्षणिक संस्थान, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और औद्योगिक भागीदार तथा देश के नागरिक डीआरडीओ के हित धारक ग्राहकों की सूची में शामिल है।
जैसा की सर्वविदित है कि भविष्य के युद्ध तकनीक और प्रौद्योगिकी के दम पर लड़े जाएंगे जिसमें रासायनिक, जैविक हमलों से लेकर कृत्रिम बुद्धिमता तक शामिल है; आने वाला युग कृत्रिम बुद्धिमता का युग होने वाला है; ऐसे में यह अति आवश्यक हो जाता है कि भारत भी इस क्षेत्र का एक कुशल योद्धा बनकर उभरे और अपने विकसित हो या विकासशील दुश्मन देशों के आंख में आंख डालकर उसकी चुनौती का सामना करे, जिसके लिए अभी से ही तैयार होने की आवश्यकता है।
अतः कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिदृश्य में देश की सुरक्षा की बागडोर कुशल हाथों में है जिसका नेतृत्व पिछले कई वर्षों से डीआरडीओ कर रहा है और यह संगठन एक नाम ही नहीं बल्कि विश्व भर के रक्षा बाजारों में एक ब्रांड बन चुका है जिसके नाम से ही उसकी उच्च गुणवत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है डीआरडीओ को भविष्य के युद्ध लड़ने के लिए इसलिए भी तैयार होना होगा ताकि हम दुनिया के देशों को आंखें दिखा कर नहीं बल्कि आंखों से आंखें मिलाकर बात कर सके जो "बलस्य मूलम विज्ञानम" डीआरडीओ के आदर्श वाक्य की सार्थकता को सिद्ध करता है।

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