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Three years at work

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There are two different old pictures in the frame where the first one shows the charm, enthusiasm and ambitions that I had before doing a job. That was the time when I was jobless and often thought that one day I would do something that never happened in my family and undoubtedly there is no exaggeration to say that I did it to some extent. Today it's been almost 5 years difference between both of these photos where it seems that one tells the story of Ambitions. However, the second one viz. 2026 Captioned picture talk about the maturity in itself, came along with passing time. If I remember myself 5 years ago I used to write poetries by the inspiration of loved ones but there is a say that the time whether it is good or bad does not sustains for long and there is a specialty about time is that it changes with time, today my skill of poetries getting faded day by day but on the other hand the skill related to work, the sense of maturity and experience getting enhanced ...

दो अजनबी

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तुम मेरी ज़िंदगी से बहुत दूर चले गए हो; ये सोचकर सारी उम्मीदें धुआं हो गई थी। उदास, निराश, हताश सा मैं, मैं जैसा नहीं था और फ़िर अब मैं धीरे-धीरे सामान्य हो रहा था। और-और फिर एक दिन किसे पता था कि तुम अचानक कुछ सालों बाद उसी मोड़ पर आकर मुझे फिर इस तरह मिल जाओगे, तुम्हारा इस तरह मिलना? इसे खुद की इनायत समझूं ? या फिर अनसुलझी सी कोई पहेली ? जिसे जितना सुलझाने की कोशिश करो वो उतना ही उलझते सी चली जाती है; अब इस, इस मुलाकात को मैं क्या नाम दूं ? इस्तकबाल करूं तुम्हारा ? या एक बार फिर से इसे समझूं हमारी बर्बादी का इशारा। जिंदगी में क्यों अक्सर वही होता है; जिसका मुकाबला हम कभी नहीं करना चाहते, ये दुनिया भी अजीब है छोटी, और बहुत ही छोटी, दूर जाने की कवायत में घूम कर आखिरकार एक ही दोराहे पर आकर दो अजनबी फिर मिल जाते हैं उसी तरह जिस तरह घड़ी की दो सुइयां और उसके बाद फ़िर से वो दूर होकर अजनबी बन जाते हैं, जैसे वो कभी एक दूसरे को जानते ही नहीं थे; वो कभी एक दूसरे से मिले ही नहीं थे। वक्त रहते अगर ख्वाहिशें मुकम्मल हो जाए तब तो उनका औचित्य रहता है वर्ना सब बेकार है, अब वो सारी बाते...

डीआरडीओ(DRDO) की गौरवगाथा

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डीआरडीओ यानी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाली रिसर्च एंड डेवलपमेंट विंग है, जिसकी स्थापना वर्ष 1958 में डॉक्टर डीएस कोठारी जी के नेतृत्व में देश को अत्याधुनिक स्वदेशी रक्षा उपकरण प्रणाली से लैस करने के उद्देश्य से की गई थी। वर्तमान में डॉक्टर समीर वी. कामत जी इसके मुख्य पद पर कार्यरत हैं, डीआरडीओ ने रक्षा के क्षेत्र में 1958 से लेकर के अब तक राष्ट्र सेवा में अतिसक्रियतावाद की भूमिका निभाई है। डीआरडीओ का आदर्श वाक्य है "बलस्य मूलम विज्ञानम" अर्थात शक्ति का स्रोत विज्ञान है, जो शांति और युद्ध में राष्ट्र को संचालित करता है और इसी आदर्श वाक्य की कसौटी पर चलकर डीआरडीओ आज भारत के अग्रणी रक्षा संस्थानों में से एक बन चुका है, इसके नाम अनगिनत उपलब्धियां और अनेकों कीर्तिमान स्थापित है। तीन तरफ से समुद्र से घिरा प्रायद्वीपीय भारत दक्षिण एशिया में शुरू से ही अपने दो बड़े प्रतिद्वंद्वियों का सामना कर रहा था लिहाजा 1947-1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के पश्चात यह आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी, कि देश को अपनी संप्रभुता और अखंडता को बनाए...

वर्तमान अमेरिकी नीति और भारत के हित

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  पिछले कुछ समय में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि विश्व में अस्थिरता का दौर अपनी पराकाष्ठा पर है, ऐसे मेें एक तरफ़ विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका तो दूसरी तरफ़ विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत है, जिसके मध्य फिल्हाल आर्थिक स्तर पर टैरिफ़ को लेकर खींचतान चल रही है; दूसरे कार्यकाल मेें अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के तल्ख तेवर निर्विवाद रूप से दुनिया के तमाम देशों के लिए सकारात्मक संकेत नहीं है। इसी क्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा करके भारत के आर्थिक गलियारों में हलचल मचा दी है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के बाद से भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों में लगातार तेज़ी आई। हालांकि बीते कुछ समय से ख़ासकर ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल से ही राष्ट्रपति ट्रम्प कभी ऑपरेशन सिंदुर पर भारत और पाकिस्तान के बीच; तो कभी कम्बोडिया और थाईलैंड के बीच मध्यस्थता कराने की बात करके विश्व समुदाय की नज़रों मेें शांतिदूत बनने की कोशिश करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ रहे हैं और ऐसा हो भी क्यों न राजनीति के कुछ दिग्गजों की थ्योरी कहत...

तकनीक का बदलता स्वरूप- कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence)

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तकनीक का बदलता स्वरूप Artificial intelligence यानी कृत्रिम मेधा का सृजन क्या वाकई मानव हित में है ? या फ़िर आगामी वर्षों में यह स्वयं मानव और उसके अस्तित्व के लिए एक चुनौती बन जाएगा ? ये सच है कि बदलती और उन्नत होती तकनीक ने मनुष्य के जीवन को सुगम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन इस बात को भी स्वीकार करने में कोई अचरज या हैरानी नहीं होनी चाहिए कि यदि इस तकनीक को और भी उन्नत कर दिया जाए, जोकि मानव के बूते की बात है भी, तो वर्चस्व तो छोड़िए मानव अस्तित्व के लिए भी यह ख़तरनाक साबित हो सकता है, जिसका एक सीधा सा उदाहरण उद्योग घराने और निजी क्षेत्रों से कार्मिकों की छंटनी है, बात अगर सिर्फ़ छंटनी तक ही सीमित हो तो भी विकल्प तलाशा जा सकता है लेकिन इसके द्वारा होने वाले दुरुपयोग की क्षतिपूर्ति करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन भी है, अक्सर आपने लोगों को ज़िक्र करते या समाचार प्रसारण या प्रिंट मीडिया के माध्यम से सुना होगा deep fake वीडियो, जो और कुछ नहीं कृत्रिम मेधा का एक बेहद छोटा सा नमूना मात्र है, आराम से लेकर घर के काम सभी चीज़ों को उपलब्ध करने और कराने में इसे महारथ हा...

प्रेम और स्वतंत्रता

                      🕊️"प्रेम" और "स्वतंत्रता"🕊️  शब्दों के जोड़े के रूप में चित्र के साथ प्रतीत होता केवल सामान्य सा उद्धरण मात्र, जो प्रश्नचिन्ह के अभाव में किसी भी प्रकार के प्रश्न की मांग करता नहीं दिखता, लेकिन उद्धरण से इतर होकर शब्दों की गहराई में जाने पर दोनों शब्दों को अंतरसम्बद्ध करने के पश्चात्, चित्त में जो दार्शनिक भाव उत्पन्न होगा, वो स्वतः उद्धरण के गौण रूप में छिपी प्रश्नवाचक प्रवृत्ति को उजागर कर देगा, जो उस प्रकार से उलझाने के लिए पर्याप्त है, जिस प्रकार आज अधिकतर लोग पहले मुर्गी आई या अंडा के प्रश्न पर उलझे हुए हैं।