दो अजनबी
तुम मेरी ज़िंदगी से बहुत दूर चले गए हो; ये सोचकर सारी उम्मीदें धुआं हो गई थी। उदास, निराश, हताश सा मैं, मैं जैसा नहीं था और फ़िर अब मैं धीरे-धीरे सामान्य हो रहा था। और-और फिर एक दिन किसे पता था कि तुम अचानक कुछ सालों बाद उसी मोड़ पर आकर मुझे फिर इस तरह मिल जाओगे, तुम्हारा इस तरह मिलना? इसे खुद की इनायत समझूं ? या फिर अनसुलझी सी कोई पहेली ? जिसे जितना सुलझाने की कोशिश करो वो उतना ही उलझते सी चली जाती है; अब इस, इस मुलाकात को मैं क्या नाम दूं ? इस्तकबाल करूं तुम्हारा ? या एक बार फिर से इसे समझूं हमारी बर्बादी का इशारा। जिंदगी में क्यों अक्सर वही होता है; जिसका मुकाबला हम कभी नहीं करना चाहते, ये दुनिया भी अजीब है छोटी, और बहुत ही छोटी, दूर जाने की कवायत में घूम कर आखिरकार एक ही दोराहे पर आकर दो अजनबी फिर मिल जाते हैं उसी तरह जिस तरह घड़ी की दो सुइयां और उसके बाद फ़िर से वो दूर होकर अजनबी बन जाते हैं, जैसे वो कभी एक दूसरे को जानते ही नहीं थे; वो कभी एक दूसरे से मिले ही नहीं थे। वक्त रहते अगर ख्वाहिशें मुकम्मल हो जाए तब तो उनका औचित्य रहता है वर्ना सब बेकार है, अब वो सारी बाते...