16 सितंबर 2022, मेरे जीवन के अध्याय में दर्ज एक काला दिन
16.09.2022 सोलह सितम्बर 2022 मेरे जीवन के अध्याय में दर्ज एक काला दिन, जिसने मेरी अंतरात्मा को झकझोर दिया, आज से ठीक एक साल पहले, यही वो दिन था, जब मैंने वो सब महसूस किया, जो उससे पहले कभी नहीं किया था, जब मां ज़िंदगी और मौत से जूझ रही थी, अभी तो ज़िंदगी में पहली बार होने वाली दिल से दिल की गहराई वाली बातें पूरी भी नहीं हुई थी कि, हॉस्पिटल कर्मचारी मां को ऑपरेशन के लिए ले जाने वाले स्ट्रेचर अपने साथ ले आए , बातें अधूरी रह गई थी और जज़्बात सिसकते रह गए,
घंटों लंबे समय तक चलने वाला ये ऑपरेशन जिसमें पेट के चीथड़ों को 40 टांके लगाने के बाद सिला गया, जहां नाज़ुक स्थिति इस तरह से बनी थी कि बचने की सम्भावना कम और मरने की बहुत ज़्यादा थी, उस दिन खुद की कुव्वत पर गुमान रखने वाला मैं, खुद को पहचान चुका था कि मैं तो अंदर से खोखला हूं, जब ऑपरेशन के बीचों बीच ख़बर आई कि अब कुछ भी हो सकता है, तब मुझे महसूस हुआ कि, मैं तो अपने छोटे भाई बहनों से भी छोटा जिगर रखता हूं जब तक ऑपरेशन के सफ़ल होने की ख़बर सुनकर इन आंखों ने मां को देखकर तसल्ली नहीं कर ली तब तक, शेड के नीचे भीड़ और छोटे भाई बहनों के सामने, न ही आंसू थमे और न ही आसमान से होने वाली 16 सितंबर की कयामत वाली वो बारिश, और इस दौरान मैंने वो सब महसूस किया जो 31 साल का एक नालायक, नाकाम, और निकम्मा बेटा महसूस कर सकता था, जिसने कभी मां बाप के लिए कुछ न किया हो, मन में एक ही बात, अगर उस समय मां को कुछ हो गया होता, तो जीवन भर मैं खुद को कभी जवाब नहीं दे पाता, मन बेचैन हो रहा था, सवाल और जवाब दिमाग में थे, आंखों में आंसू और आसमान से टपकती बारिश की बूंदें, जैसे मेरे सीने को चीरकर समय की बर्फ़ के साथ साथ मेरे दिल को जमा कर बेजान बना रही थी, और फ़िर एक ख़बर, कुछ आस और मां को ज़िंदा देखकर विश्वास हुआ, फ़िर लगा कि बस ज़िंदा रहे चाहे किसी भी हाल में, उस रात में और आज की रात में अंतर इतना है कि उस रात एक डर था कि इस काली रात के बाद मेरी जिंदगी में सिर पर आंचल वाली सुबह होगी या नहीं और आज मेरे सिर पर मां का आंचल भी है और पिता का साया भी, आज मैं ख़ुद को दुनिया के उन खुशकिस्मत लोगों के बीच का हिस्सा मानता हूं, जिनके मां बाप इस उम्र में भी उनके साथ मजबूती से डंटे हैं, इंसान को किसी की अहमियत का पता तब चलता है, जब उस चीज़ के खोने का डर उसे मार जाए, और अंत में वो उसे हासिल हो जाए, लेकिन गर हांसिल ही ना हो या उम्मीद ही मर जाए, तो अक्सर डर भी खतम हो जाता है, शायद यहीं से "खोने को कुछ नहीं है मेरे पास"इस तरह के वाक्यों का जन्म हुआ होगा,अक्सर मैं जुनून की आग में सुकून का सौदा कर लेता हूं, जबकि असल में कोई इस दिल से पूछे तो सदाएं हमेशा एक ही आवाज़ देती है, "अब बस सुकूं", और थोड़ा उस स्टेशन पर रुककर अपनों के साथ वक्त बिताया जाए, जहां तितर बितर होने से पहले सभी लोग इकठ्ठा होकर कुछ समय के लिए दिल से जुड़ जाते हैं, इससे पहले जिंदगी की ट्रेन सबको तितर बितर कर दे, एक बार मिलकर जी लिया जाए, कल किसने देखा है।
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