दोस्त अब थकने लगे हैं


25 मई लोकतंत्र के महापर्व यानी मतदान के दिन सुबह तड़के अपना वोट डालकर चिलचिलाती धूप ढलने का इंतज़ार करने के बाद भीनी-भीनी झीनी-झीनी शाम में मैं अपने पुराने संघर्ष के साथियों से मिलने चल पड़ा, इन सभी से मिलने की उत्सुकता हालांकि हर समय बनी रहती है, लेकिन दिन शनिवार का था लिहाज़ा ये उत्सुकता व्याकुलता में तब्दील होते ज़्यादा देर न लगी, और देखते देखते मैं द्वारका भी पंहुच गया, यहां मीटिंग पॉइंट पर एक से हम दो हुए और दो से तीन और फ़िर तीन से तीनों मिलकर एक हो गए, कमी थी तो बस एक और इडियट की जो सुदूर रोज़ी रोटी की जद्दोजहद में घर से पिछले कई सालों से एकांतवास काट रहा है, हमारा तो मिलना हो जाता है, लेकिन उस बेचारे की सुध लेने वाला कौन है, उस पर क्या बितती होगी, सोचकर मन पसीज उठता है, ख़ैर बात वहीं से शुरू करता हूं जहां से छोड़ा था, हम तीनों को आपस में हर एक को देखते ही चेहरे खिले हुए और एक मीठी मुस्कान थी, एक दूसरे से गले लगकर तीनों दोस्तों ने जैसे एक दूसरे के कंधे को ठंडक दी और सुकून जैसे रूह में उतर सी गई, मिलने के बाद बहुत सी बातों पर चर्चा और गहन चिंतन हुआ, जिसमें करियर, निजी जीवन और घर गृहस्थ शुरू कब होगा इन बातों पर ज़्यादा ज़ोर था, लेकिन इन सभी विमर्श से इतर मैंने आज सभी को थका थका महसूस किया, हो भी क्यों ना, जिस उम्र में इंसान सबसे अधिक ऊर्जावान और कर्मठ होता है वो उम्र हम चारों ने ही सरकारी नौकरी की तैयारी में खपा दिया, मुहब्बत, मौज और मस्ती सभी को नौकरी की भेंट चढ़ा दी, उस समय मुझे याद है हम सभी बहुत यंग हुआ करते थे वो चार्म अलग ही था, वो जोश वो उत्साह लाइब्रेरी में बैठना सभी के चेहरे दिन भर की थकान के बाद भी खिले रहते थे, लेकिन आज उन चेहरों पर थकान दिखने लगी है, चेहरों में एक उदासीपन कैरियर और भविष्य को लेकर चिंता साफ़ दिख रही थी, हम परदेसी भाऊ को छोड़कर हम तीनों ही अभी बैचलर की ज़िन्दगी को जी रहे हैं, हम सभी अब 30 की दहलीज़ पार कर चुके हैं, किसी ने सच लिखा है दोस्त अब थकने लगे हैं, ये वही दोस्त हैं जिन्होंने मुझे मेरे बार बार गिरने पर मुझे बैसाखी बनकर सहारा दिया, ये वही दोस्त हैं जिन्होंने मुझे थोड़ा बहुत भी उठा हूं तो उसमें उन्होंने सहारे के रूप में मुझे कांधा दिया, इन्हें कैसे भूल जाऊंगा,परिवार के बाद ये दोस्ती और ये प्यार ही तो है, जो कभी इस दुनिया में पराया नहीं होने देता, अकेलापन महसूस नहीं होने देता, अब हम सभी उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां करियर द्वितीयक सेकेंडरी और गृहस्थ शुरू करना प्राइमरी यानी प्राथमिक हो चुका है, क्योंकि करियर लगभग सेटल है सभी का, अब जिसकी भी शादी पहले होगी बस उसकी शादी में तो सबसे पहले जी भर के दिल खोल कर नाचना है, इससे पहले की ज़िंदगी की आपा धापी इंसान को और थका दे, और इस पशोपेश में अपने शौक यानी अपनी लेखनी को और अपनी मृतप्राय रुचि को मैं एक बार फ़िर से जीवंत करना चाहता हूं, मैं फ़िर से लिखना चाहता हूं मैं फ़िर से जीना चाहता हूं, मैं इस दुनिया को अपने इडियट दोस्तों के साथ जीना चाहता हूं, जल्द ही हम कहीं बाहर का ट्रिप प्लान करके एक अनजानी यात्रा पर निकलेंगे जहां जाना तय ना हो, जहां सुकून हो, शांति हो, आत्मा से आत्मा का मिलन हो और मेरे इडियट दोस्त हों 

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