प्रेम और वैराग्य



जीवन की घटना इस जगत में मात्र एक घटना है, जो सत्य प्रतीत होती है किंतु सृजनकर्ता के सृजत इस जगत और काया में केवल एकमात्र शास्वत सत्य प्रेम और दूसरा निसंदेह मृत्यु है।
मनुष्य जब जन्म लेता है तब ठीक उसी फूल के जैसे होता है, जैसा बागीचे में बीज के भीतर अंकुर फूटता गुलाब का फूल, जिसे उस बागीचे का माली नितप्राय उसे प्रातः काल प्रेमपूर्वक उसकी देखभाल करता है और उसे बच्चे की भांति एक लंबे समय तक सींचता है।
किसी पादप में पहले बीज, फिर तना, फिर कली, फिर फूल और फिर फल, शून्य होकर आत्मविश्लेषण करने पर एक अचरज, अचम्भा और अद्भुद चमत्कार की भांति प्रतीत होता है क्योंकि हमारे समक्ष संसार की अनेक चीजें, जस की तस रहती हैं।
बीज के फल देने पर प्राय: हम महत्वपूर्ण गुणांक अर्थात् माली को भूल जाते हैं। जिसकी भूमिका पट्ट के पीछे सबसे बड़ी है, दोनों की एक दूसरे के प्रति इस परस्पर भूमिका में यदि, सिंचाई और देखभाल की भूमिका माली ने निभाई तो एक भूमिका का निर्वहन स्वयं प्राकृतिक रूप से प्रकृति ने कर दिया। मृदा, वायु, प्रकाश, जल और मां प्रकृति ने अपनी पूरी उर्जा लगा दी, एक बीज को फल बनाने में उसे सजीव बनाने में।
जिस प्रकार एक फूल को माली की आवश्यकता है जो उसे प्रेमपूर्वक समय-समय पर सींचता रहे, उसी प्रकार की आवश्यकता ईश्वर की सृजत सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य को मनुष्य की ही होती है।
नर और नारी चुंबक के दो ध्रुव की भांति हैं। जहां आकर्षण स्वाभाविक ही नहीं अपितु प्राकृतिक है और जिस प्रकार दो ध्रुव के आपसी आकर्षण के बाद टकराने पर उर्जा का उद्गार होता है और भूशास्त्रीयों के अनुसार भी ब्रह्मांड की उत्पत्ति जैसे हुई है। उसी प्रकार दो मनुष्यों के आकर्षण से उर्जा का उत्पन्न होना प्राकृतिक ही है। वह आकर्षित हों तो भी और स्थायित्व स्थिति में अडिग हों तो भी, मुख्यत: एक ही विषय है, आकर्षण की उर्जा से उत्पन्न प्रेम की शक्ति या जिस प्रेम से आकर्षण की शक्ति उत्पन्न होती है।
यह शक्ति यदि मिलकर अर्थात् गतिज उर्जा के साथ में निकट आने पर उत्पन्न होती है तो प्रेम की शक्ति के रूप में फलीभूत हो जाती है और यदि स्थायित्व अर्थात् स्थितिज उर्जा या जस की तस या वियोग के रूप में हो तो प्रेम के साथ साथ वैराग्य की अवस्था को प्राप्त हो जाती है। तत्पश्तात् मनुष्य प्रकृति के प्रत्येक अंक का और प्रकृति का हो जाता है। स्पष्ट शब्दों में वह ईश्वर का हो जाता है, वह प्रकृति का हो जाता है। वह सबका होकर के भी किसी का नहीं होता, वह सांसारिक मोह माया से विरक्त हो जाता है और संन्यास के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है और संन्यास स्वयं में प्रेम की कल्याणकारी अवधारणा है जिसे प्राप्त करना बुद्धत्व, कैवल्य और मोक्ष को प्राप्त कर लेने, उसे पा लेने के समान है।
इन सभी शाश्वत तात्विक अवस्था की अनुभूति का एकमात्र मार्ग निस्वार्थ और सच्चे प्रेम का पादप की भाँति पनपना और उसमें डूबकर उसे पराकाष्ठा तक पंहुचाना है जो वैराग्य की स्थिति का एकमात्र साधन है। अत: प्रेम ही ईश्वर, वैराग और संन्यास प्राप्ति का एकमात्र साधन है।


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