जीवन और अनुभव


दो घटनाएं जो ज़िंदगी में अक्सर साथ होती है, एक है वक्त का दुर्गम परिस्थितियों से गुज़रते हुए तेज़ी से बीतते रहना और दूसरा जो इसका जिगरी यार है, वो है बीतते वक्त के साथ-साथ उसके जय-वीरू जैसे जोड़ीदार ख्वाहिशों का भी उसके साथ मरते रहना, किसी बड़े शायर ने कहा है ख्वाहिशों का मर जाना इस दुनियां की दर्दनाक घटनाओं में से एक है, जब एक बच्चे का बचपना बरकरार रहता है तो निश्चित ही उसकी सुंदरता और सार्थकता उसके बाललीला को देखने में है, जो ज़िंदगी भर के लिए उसकी यादें बन जाती हैं, जिसे वो अपने बड़ों से, बुजुर्गों से, और अपने परिजनों से बड़े चाव से उम्र भर सुनता है लेकिन हालात तो उस बच्चे को भी मज़दूर बना देते हैं जिसकी उम्र खिलौनों से खेलने की होती है, बाल अवस्था, किशोर, व्यस्क, और बुढ़ापा किसी पिक्चर के डायलॉग नहीं, बल्कि ज़िन्दगी की सच्चाई है जिसमें उस व्यक्ति से उसी तरह का व्यवहार वैसे ही अपेक्षित होता है जितनी की उसकी उम्र, लेकिन वक्त, हालात और परिस्थिति बहुत ज़ालिम स्वभाव की होती है, ये मासूमियत और हैवानियत में फ़र्क कहां जानती है, लेकिन जिसपर ये कहर बनकर टूटता है वो या तो टूट जाता है या फ़िर कुछ समय बाद बांस के पेड़ की तरह छप्पर फाड़ कर फिर से उगता है, ज़िन्दगी में बीतने वाले हालातों और अनुभव की किताब उस गुरु जैसे होते हैं जिन्हें असल में गुरु मानने के बाद कोई भी इंसान अकेला ही खु़द का शिक्षक और अपनी अंतरात्मा का ही विद्यार्थी भी बन जाता है, विज्ञान और इतिहास गवाह है कि दुनियां में पहले घटना हुई उसके बाद उनसे उबरने के सूत्र किताबों के अनुभव और case study के रूप में सिद्धांतवादी और अवधारणात्मक रूप में वजूद में आई, और उससे उबरने का दंभ भरती ये किताबें अगर हर तरह से सक्षम होती तो, अनुभव और किसी भी हालात का सामना करने वाले से ज़्यादा चर्चे आज भी किताबों के ही होते, ज़िंदगी की किताब अक्सर बहुत कम समय में वो सब सिखा देती है, जो ज़िंदगी भर किताबों को चाटकर भी नहीं सीखा जा सकता, किसी ख़्वाब को हकीकत करने की चाह में, आज को ख़तम कर देना, खुद को खत्म कर देने जैसा है, और एक समय बाद अंत में उन ख़्वाब से कहीं बढ़कर सुकून,शांति और अपनों पर जाकर ये जद्दोजेहद थमती है, तब तक किला तो फतह हो जाता है लेकिन समय अपने और सपने जिनके साथ जीने के ख़्वाब देखे जाते थे, वो सब पीछे रास्ते में छूट चुके होते हैं और आप शिखर पर होते तो हैं लेकिन अकेले, तब वो कामयाबी निरर्थक लगती है, क्योंकि आप शिखर पर तो हैं लेकिन अकेले, जबकि मनुष्य एक सामाजिक और मिलनसार प्राणी है, खोने को ज़्यादा कुछ बचता नहीं क्योंकि जिसके लिए पाना था वो तो रास्ते में ही छूट चुका है, और मज़ा मंजिल से कहीं ज़्यादा सफ़र को जीने में है, ये शोहरत और कामयाबी उसी मंज़िल की तरह है जो शाश्वत सत्य मृत्यु है, मैं मंज़िल ढूंढने की चाह में घर से निकलता तो हूं, लेकिन मैं मंज़िल से भटकर मुसाफ़िर से प्यार कर बैठता हूं, मैं मंजिल से भटककर पथ भ्रमित हो जाता हूं, क्योंकि मैं घुमक्कड़ किस्म का भौंरा हूं, मुझे रास्ते अच्छे लगते हैं, मुझे मुसाफ़िर अच्छे लगते हैं, ख्वाहिशें मरते चली गईं, और हम लड़ते चले गए, जब जीना रास नहीं आता तो इंसान मरने पर अमादा हो जाता है और यहां से ही आई होगी ये पंक्तियां "वो जो आज मरने पर अमादा है उसने कभी जीकर भी तो देखा होगा" , खुशियों ने, अपनों ने साथ छोड़ा, तो फ़िर गम और उसके बाद पूरी दुनियां का साथ साथ मिल गया, अब वही अपने छोड़ गए, किसी ने साथ छोड़ा, कुछ छोड़कर चले गए, कुछ तो कुछ अपनों ने दुनियां छोड़ दी और कुछ साथ निकले थे और आगे निकलते ही छोड़ गए, लेकिन इन सबमें तटस्थ होकर मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी, बहुत भारी कीमत चुकाई है, और अब बॉर्डर फिल्म के अक्षय खन्ना के माफिक स्वभाव हो चुका है, इतना आगे इतनी दूर तक आकर जब सब खत्म होने को है, तो सीना तान कर आगे बढ़ो, इस ज़िंदगी में दो चीज़ें हैं पहला खुद ज़िंदगी और दूसरा वही शाश्वत सत्य, जी वही सकता है  जो मरना जानता है या जिसे मरने का डर नहीं, ज़िंदगी चार दिन की हो या 4 साल की ये लंबी हो या ना हो लेकिन बड़ी ज़रूर होनी चाहिए बाबू मोशाय, कुछ ऐसा करो कि दुनिया तुम्हें याद करे न करे, तुम्हारे किए गए ऐतिहासिक काम को तो, कम से कम, ज़रूर याद करे, ज़िद, ज़मीर और जुनून इनसे वफ़ा और इन्हें ज़िंदा रखने के बाद ज़िंदगी में फ़िर कभी दगा नहीं मिल सकता, खुद के लिए नहीं तो जियो अपनों के लिए, समाज के लिए, देश के लिए, दुनिया के लिए और इससे कहीं बढ़कर मानवता और इंसानियत के लिए, क्योंकि इतिहास गवाह है, जब-जब कोई ऐसे जिया है वो इंसान नहीं, इतिहास ही बना है, एक समय इनपर वैराग्य हावी था और आज ये इतिहास हैं, लेकिन आप इतिहास नहीं तो समाज के लिए वर्तमान तो बन ही सकते हैं, जो कुछ समय के लिए ही सही लेकिन जब तक जल रहा है, तब तक किसी के घर को रौशन कर उसकी ज़िंदगी में चिराग की भूमिका में आज भी वजूद में है। रावण त्रिलोकविजेता था, अपनी मर्यादा नहीं भूला था, जो किया अपनों के लिए किया, और उसके अपनों के लिए उसके प्रेम ने बदले की आग में उसे अहंकार की इंतेहा तक पंहुच दिया, और अपनों के लिए अपनों के बताए भेद से ही मारा गया, वो दुनिया से जीतकर अपनों से हार गया, धोखा और गलत तो उसके साथ भी हुआ और अंतरात्मा से आखरी समय में जब उसका अंत था, तो शेषनाग के अवतार लक्ष्मण जी को भी ज्ञान दे पाने में सक्षम था, मैं निष्पक्षता पूर्वक अपने चेतन मन और अपने व्यक्तिगत विचार से कह सकता हूं , मेरे लिए भगवान श्री राम और रावण दोनों ही एक पूजनीय तो एक अपने फर्ज़ को निभाने की अपनी अदा के कारण आदर के योग्य हैं, अहंकार उत्पत्ति है सिर्फ़ और सिर्फ़ परिस्थिति मात्र की, जो प्रतिकूल स्थिति में, उत्पन्न हो जाती है, मुझे दोनों के व्यक्तित्व दमदार लगते हैं, मैं दोनों के ही स्वाभिमान और अभिमान का कायल हूं, एक ने अपनों के लिए संहार कर दिया तो एक ने अपने परिवार या बहन के लिए, मन में मोक्ष का भाव रखकर अहंकारी बन, साक्षात ईश्वर से लड़ गया और इतिहास के पन्नों में हमेशा-हमेशा के लिए खलनायक बन गया और इस तरह के रावण रूपी खलनायक समाज में आज भी अस्तित्व में हैं, नज़रिया देखने का है बस और कुछ नहीं- सुदेश❤️ कुमार 








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