एक कहानी जो छू गई
कौन और यहां तक कि मैं खुद भी नहीं जानता था कि रात 1 बजे चांदनी रात में मेरी हाइड्रोलिक कुर्सी पर एकाग्र बैठकर शुरू होने वाली चार घंटे की निरंतर पढ़ी जाने वाली ये किताब (मुसाफ़िर❤️cafe) सुबह की पहली किरण के साथ मुझे एक नया दृष्टिकोण दे जाएगी, प्रेम,मर्म,संवेदना और समर्पण की तलहटी में मुझे कुछ और गहराई में झोंक देगी, एक स्त्री के प्रति, साहित्य के प्रति, प्रेम के प्रति अटूट और शाश्वत प्रेम व गहरे बंधन की नींव के निर्माण का अभूतपूर्व कार्य करेगी, जिसमें हो सकता है कि आने वाले समय में भविष्य में प्रेम और जीवन के प्रति रूढ़िवादी सोच में थोड़ा परिवर्तन के बाद उदार मानसिकता अभिवृत्तिक परिवर्तन के रूप में देखने को मिले, मैंने शनिवार कि देर रात 12 बजे के बाद जिसे रविवार ही कहा जाएगा 1 बजे से पढ़ना शुरू किया और पढ़ते पढ़ते कब सुबह के 5बज गए और 4घंटे में कैसे 144 पन्ने खतम हो गए पता तक नहीं चला, किताब पढ़ते समय इन चार घंटे तक कहानी का किरदार मैं ख़ुद बना रहा ,और ऐसा कई बार हुआ जब रोना तो चाहा लेकिन मज़बूत बनकर खुद को रोने से रोककर रखा ताकि कहीं कोई रोते हुए सुन न ले, कि क्या पढ़ने लगा है आजकल ? लाइट क्यों जला रखी है कमरे की अब तक ? सवाल जवाब के डर से पन्ने धीरे-धीरे से पलट रहा था। रौंगटे खड़े हो रहे थे, सारी रात नींद उड़ी हुई थी और मैं कहानी में इतना डूब गया कि उसके character को इंटरनेट और (मुसाफ़िर❤️cafe) को सर्च करने लगा
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